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22 मार्च 2017

गृह-प्रवेश से पहले शुद्धिकरण क्यों आवश्यक है ?

"गुरू जी एक बात बताइये ?
क्या उस स्थान का शुद्धिकरण करना उचित है, जहाँ हाल ही में कोई परिवार रह कर गया हो ?

विशुद्ध चैतन्य जी, अगर उचित है तो फिर अगर में नेता हु तो मुझे भी शुद्धिकरण कराना चाहिए ?

हाँ स्थान के बजाए वोटो का शुद्धिकरण कराना चाहिए, पता नही किस किस प्रजाति के मनुष्यों ने मुझे वोट दिया हो ?" -Asif Khan


योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री आवास में प्रवेश से पहले शुद्धिकरण करवाया तो उपरोक्त प्रश्न हर जगह से उठने लगे | जो भी खुद को पढ़ा-लिखा आधुनिक व वैज्ञानिक सोच का मानता है, वह इसी प्रश्न को अलग अलग रूपों में उछाल रहा है | कुछ इसे जातिवाद से जोड़ रहे हैं तो कुछ रूढ़ीवाद व अन्धविश्वास से | इसका कारण केवल इतना ही है, कि जैसे जैसे मनुष्य पढ़ा-लिखा व आधुनिक होता चला गया, उसकी ज्ञानेन्द्रिया कमजोर होतीं चलीं गयीं | वह मात्र एक मशीन बनकर रह गया और उतनी भी प्राकृतिक क्षमता नहीं बचा पाया, जितनी की पशु-पक्षियों में होती हैं | चलिए मैं आपको समझाता हूँ कि शुद्धिकरण क्यों आवश्यक है नए या कई वर्षों तक दूसरों के द्वारा प्रयोग हुए घर में प्रवेश से पहले |
सबसे पहले तो आप एक प्रयोग करके देखिये | किसी भी पार्क या पब्लिक प्लेस में ऐसी जगह खोजिये, जहाँ एकांत हो | वहां आप शांत होकर आँख बंद करके बैठ जाइए और अपने भीतर की स्थिति को अनुभव करने का प्रयास कीजिये | जब आप अपनी स्थिति से परिचित हो जाएँ, यानि आपको पता चल जाए कि आप दुखी हैं, सुखी हैं, उग्र हैं, क्रोध में हैं.....आदि इत्यादि | उसके बाद आप उस एकांत स्थान पर जो आये आप अपने भीतर झांकिए कि क्या परिवर्तन हुआ | आप पाएंगे कि जब भी कोई व्यक्ति आपके क्षेत्र में आता है यानि अट्ठारह फीड के दायरे में, आपके भीतर की स्थिति में कुछ परिवर्तन होता है.. जैसे किसी ने शांत झील में पत्थर मार दिया हो और तरंगें उठने लगीं | यदि आप शहरी हैं और बहुत ही भीड़-भाड़ वाली जगह पर रहते हैं, तो आपका दायरा अट्ठारह फीट से बहुत कम हो सकता है यानि दो या तीन फीट |

आपने यह भी नोटिस किया होगा कि कई बार आप कहीं बैठे हैं और किसी के आने पर आपको बेचैनी होने लगती है, चाहे आपको यह पता ही न हो कि कोई आपके आस पास आया है | जब बेचैनी होती है, तब आप जब इधर उधर देखते हैं, तब पाते हैं कि कोई व्यक्ति आपके ही आसपास कहीं खड़ा है | इसी प्रकार आप कहीं पार्क में बैठे किताब पढ़ रहे होते हैं या आराम ही कर रहे होते हैं, अचानक आपको भीतर आनन्द बढ़ने का अनुभव होता है, और आप जब इधर उधर देखते हैं तो पाते हैं कि कोई व्यक्ति आपके ही आसपास अभी अभी आया है |

तो हम सभी यानि दुनिया में जितने भी प्राणी या वस्तुएं हैं, वे सभी अपनी अपनी उर्जा लिए हुए होते हैं | सभी की उर्जा भिन्न भिन्न होतीं हैं | इन उर्जाओं को हम दो रूपों में बाँटते हैं, सकारात्मक व नकारात्मक | सकारात्मक उर्जा वह है, जिससे हमें ख़ुशी मिलती है, आनन्द मिलता है | और नकारात्मक उर्जा वह है, जिससे हमारे भीतर नकारात्मक भाव पैदा होते हैं | जो व्यक्ति किसी के लिए नकारात्मक हो, वही दूसरे के लिए भी होगा यह आवश्यक नहीं है | इसे इस तरह समझ लीजिये कि कोई नेता हमें बिलकुल पसंद नहीं, लेकिन वही नेता लाखों को पसंद है | घर में कोई व्यक्ति आता है तो घर के सभी सदस्य खुश हो सकते हैं, लेकिन आपको उसके आते ही बेचैनी होने लगती है, जबकि वह आपके विरुद्ध कुछ भी नहीं कहता या न ही कोई शत्रुता का भाव रखता है |

तो सम्पूर्ण सृष्टि केवल भौतिक स्थूल चीजों का ढेर मात्र नहीं है, यह उर्जाओं का तिलस्म है | हमारा पूरा शरीर भी कोई स्थूल चीज नहीं है, उर्जाओं का ही संग्रह है और हर कोशिका गतिमान है | और जब हमारा शरीर किसी ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करता है, जहाँ पहले ही बहुत सी गतिविधियाँ होती रहीं हों, जहाँ बहुत से लोग पहले से ही रह रहे हों, तब उन लोगों के सकारात्मक या नकारात्मक उर्जाओं का हम पर प्रभाव पड़ता है | हमारे भीतर डिप्रेशन का भाव आ सकता है, हमारे भीतर आत्महत्या तक का भाव आ सकता है | हमारी आरती स्थिति कमजोर होने लग सकती है, हम पर अनावश्यक कर्जो का बोझ बढ़ने लग सकता है.....

इसलिए जब भी नए मकान में हम जाते हैं, तब हम गृहप्रवेश से पहले शुद्धिकरण करते या करवाते हैं | इससे सभी तरह की उर्जायें वहां से हट जातीं हैं और हम केवल अपने लिए अनुकूल उर्जाशक्ति के साथ प्रवेश करते हैं |

हो सकता है मेरी बातें आपको अवैज्ञानिक लग रहीं हों, लेकिन मैं यह सब अपने अनुभवों से कह रहा हूँ | मैं कभी भी किसी दूसरे के (चाहे वह मित्र या बहुत करीबी ही क्यों न हो) मकान या कमरे में चैन से नहीं सो पाता कुछ दिन | हाँ में किसी होटल के कमरे में फिर भी चैन से सो लूँगा, लेकिन किसी के घर में मुझे बहुत बेचैनी होने लगती है | इसलिए मैं किसी के भी घर जाना पसंद नहीं करता, विशेषकर यदि मुझे वहां ठहरना भी पड़े | बहुत ही कम ऐसा हुआ है मेरे साथ कि मैं किसी के घर गया और मुझे बहुत आराम मिला, चैन की नींद आयी | क्योंकि हर घर में की अपनी अपनी परेशानी व समस्याएँ होतीं हैं और बहुत ही कम लोग हैं जो उन परेशानी व समस्याओं से अपने घर को नकारात्मक नहीं होने देते | वे अपने घर पहुँचते ही बाहर की सभी समस्याएँ बाहर ही छोड़ देते हैं |

शहरी लोग इन उर्जाओं के प्रति संवेदनशील नहीं होते, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों, विशेषकर बहुत ही खुले स्थान पर रहें वाले और ध्यान आदि में अधिक समय देने वाले इन उर्जाओं के प्रति विशेष संवेदनशील होते हैं |

~विशुद्ध चैतन्य







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